बरसा बादल प्रेम का (गुरु पूर्णिमा विशेष)

 

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष….

 

||श्री सद्गुरवे नमः||

 

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

 

बरसा बादल प्रेम का

 

प्रिय आत्मन्,

आज गुरु पूर्णिमा है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। ऐसा क्यों? ज्येष्ठ की पूर्णिमा को क्यों नहीं? आषाढ़ में बादल बरसते हैं। पूरी पृथ्वी 4 महीने गर्मी से पती रहती है। पूरी वनस्पति, जीव-जंतु गर्मी से तपते रहते हैं। फिर आषाढ़ में बादल आते हैं, बारिश होती है। पूरी पृथ्वी, वनस्पति, जीव-जंतु इस बारिश की रिमझिम बूंदों में नहाकर प्रसन्न हो जाते हैं। उसी प्रसन्नता के माहौल में गुरु पूर्णिमा का शुभ उत्सव मनाया जाता है।

कबीर साहब कहते हैं-

सद्गुरु हमसो रिझि कर, कहा एक प्रसंग।

बरसा बादल प्रेम का भींजि गया सब अंग।।

जब प्रेम का बादल बरस जाता है, सब अंग नहाकर पवित्र हो जाते हैं तब ही गुरु शिष्य में नई फसल लगाता है। जिस प्रकार बारिश में किसान अपने खेतों में नई फसल लगाता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्य के मन रूपी खेत में साधना के नए बीज डालता है। अभी आपने जिनका भजन सुना वे कबीर पंथी हैं। परन्तु कबीर पंथी लोग हमें कबीर पंथी मानने से इन्कार करते हैं। मैंने कबीर साहब से फोन पर पूछा था कि क्या करूँ? कबीर साहब, वैष्णव लोग मुझे वैष्णवी पंथ का मानने से इन्कार करते हैं और कबीर पंथी लोग भी अपने पंथ का मानने से इन्कार करते हैं| कबीर साहब बोले-स्वामी जी आप क्यों घबराते हैं? हमारे साथ भी तो ऐसा ही हुआ। हिन्दू हमें मुसलमान मानते थे और लोगों से कहते थे हमसे बच कर रहें| यह ऊपर से तो राम-राम कहता है, अन्दर से अल्लाह-अल्लाह करता है और मुसलमान लोग भी हमारे मुस्लिम होने से इन्कार करते थे। ऐसा तो सदा से ही युगपुरुष के  साथ होता आया है और होता रहेगा। कबीर साहब कहते हैं-‘ज्ञानी से ज्ञानी मिले, हो जाए दो बात|’ अर्थात् जब ज्ञानी से ज्ञानी मिलता है तो दंड प्रणाम होता है, फिर मौन हो जाता है। क्योंकि मौन रहकर ही ऊर्जा का स्थानांतरण (energy transfer) होता है। जब ऊर्जा स्थानांतरित होती है तो सद्गुण आते हैं जैसे दानवीरता, धैर्य, उदारता। दानवीरता तो गंगा की तरह होनी चाहिए| जितना भी अमृत ले लो, गंगा कभी मना नहीं करती। उदारता सूर्य की तरह होनी चाहिए, सूर्य सब पर अपना प्रकाश समान रूप से फैलाता है, उदार होकर प्रकाश बिखेरता है, उसे कोई परवाह नहीं कि कोई उसे धन्यवाद दे रहा है या नहीं। धैर्य पृथ्वी की तरह, पृथ्वी हर कार्य को धैर्यता से सहन करती है। जब यह गुण आ जाते हैं तब साधुता आ जाती है।

 

भगवान महावीर एवं बुद्ध

सुना है एक बार बुद्ध किसी धर्मशाला में अपने शिष्यों के साथ ठहरे थे। महावीर भी उस धर्मशाला में अपने शिष्यों के साथ ठहरने आए। बुद्ध के शिष्यों ने जब महावीर को देखा तो वे सोचने लगे चलो, आज पता चल ही जाएगा कि बड़ा कौन है! इधर महावीर के शिष्यों ने भी यही बात सोची। दोनों जब सुबह उठे तो दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और एक-दूसरे को प्रणाम किया और मौन रह गए। दोनों के शिष्य यह देखकर हैरान रह गए। बुद्ध के शिष्यों ने बुद्ध से पूछा- भगवन्! क्यों आपने कुछ महावीर को कहा नहीं, तो वे बोले- क्या कहूँ, वे तो पूर्णत्व को प्राप्त हो गए हैं! जब महावीर के शिष्यों ने महावीर से पूछा तो बोले- क्या कहूं, बुद्ध तो अथाह समुद्र हैं। इसलिए ज्ञानी से ज्ञानी मिलने पर मौन हो जाते हैं।

एक किसान कुदाल पकड़कर एक घंटे तक खेतों में कुदाल चलाए या एक आदमी 15 मिनट अपने विचारों को चलाए, दोनों में एक ही ऊर्जा लगती है।

गुरु और शिष्य मिलते हैं तो मौन हो जाते हैं। अज्ञानी से अज्ञानी मिलता है तो बातें होती हैं। गधे से गधा मिलता है तो लातें चलती हैं। परन्तु जब ज्ञानी से अज्ञानी मिलता है तो ज्ञानी को सुनना पड़ता है क्योंकि अज्ञानी में जो कूड़ा-कचरा भरा है वह ज्ञानी को ढोना पड़ता है। इसलिए गुरु लोग दो बार दिन में नहाते हैं।

जहाँ पर हो, वहीं पर रुक कर स्वयं को पहचानना शुरु कर दो अर्थात् अंतर्यात्रा प्रारम्भ करो| जिससे आप उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सको।

कबीर साहब कहते हैं-

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाए।।

प्रेम ही वास्तविकता है। जब तुम प्रेम से भर जाते हो तो घृणा स्वतः ही नष्ट हो जाती है क्योंकि तब कोई अपना-पराया नहीं रहता। जब आप प्रेम से भरे होंगे तो परमात्मा आपका अनुगामी होगा ही, पीछे-पीछे आपके दौड़ेगा।

मन तो अब निर्मल हुआ, जस गंगा का नीर।

पीछे-पीछे हरि डोले, कहत कबीर-कबीर।।

प्रेम को उपलब्ध होने में शर्त है कि आपको शीश देना होगा। शीश अर्थात् आपका अहंकार। जब तक आप अपने विचारों को, अहंकार को नहीं छोड़ेंगे तो प्रेम को कैसे उपलब्ध होंगे? जब तक गुरु को समझा नहीं, द्विज नहीं बन सके तो गुरु का आदेश कैसे मानोगे। जब शीश चला गया, उसमें भरे विचार चले गए, अहंकार चला गया, तब आप प्रेम से भर जाएंगे| क्योंकि प्रकृति का नियम है एक वस्तु के जाने पर दूसरी वस्तु उस स्थान को भर देती है। आपका अहंकार हटकर प्रेम भर गया तो गुरु का आदेश झट से मान जाएंगे।

कल हमारे यहाँ राजनेता रुहानी बाबा तथा अन्य कई लोग आए थे, हमने उनसे भी कहा और आपसे भी कहते हैं कि शब्दों का अर्थ बिगाड़ा जाता है।

जो विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करता है वह राक्षस बनता है। चाहे वह रावण हो, कंस हो, महिषासुर हो या कोई भी हो, वह अहंकार से भर जाता है।

जो इसके विपरीत गुरु के आदेश को मानता है, वह भक्त बनता है या भगवान बनता है। जैसे तुलसी, नानक, कबीर, पलटू आदि।

कबीर की माँ उनसे कहती हैं कि तुम्हारे पास राजा लोग आते हैं, उनसे कुछ तो मांग ले। कबीर जवाब देते हैं कि रावण की सोने की लंका न बची, सवा लाख पोतों में से एक भी न बचा सका, तो फिर क्यों किसी से मंगवा रही हो? कबीर साहब कहते हैं कि इन भिखमंगों से मैं क्या माँगूं! ये तो स्वयं मेरे पास कुछ न कुछ मांगने आते हैं, मेरे पास आकर कुछ न कुछ मांग रख रखते हैं। वे अपने परिवार के सदस्यों से कहते हैं-

मांगन से क्या मांगिए, बिन मांगे सब दे।

वह देने वाला दे रहा है। हजार हाथों से दे रहा है। हमें केवल असंतोष हो गया है, हमारी मांगें ही समाप्त नहीं हो पा रही हैं। इसलिए हम मन्दिर में जाकर उलाहना देते हैं क्योंकि हम संतुष्ट नहीं हैं।

इसलिए कहते हैं जो गुरु को अर्पित करो, यह सोचकर करो कि सब तो उसी का दिया है, हम केवल निमित्त बन गए हैं। उसी का दिया उसी को अर्पित कर रहे हैं। स्वयं को स्रोत न मानो। सोचो कि बड़ी कृपा की उस परमात्मा ने मुझे माध्यम बनाया। अहो भाव से भरकर गुरु गोविन्द को धन्यवाद करते रहो। तो स्वयं ही आपका स्रोत उस परम पुरुष से जुड़ जाएगा।

आपके अन्दर बैठे उस परमात्मा को मेरा नमस्कार है। मेरा नमस्कार स्वीकार करें। धन्यवाद!

।। हरि ॐ।।

 

समय के सद्गुरु स्वामी श्री कृष्णानंद जी महाराज कि अनमोल कृति ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ से उद्धृत….

 

 


‘समय के सदगुरु’ स्वामी  कृष्णानंद  जी महाराज

आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|

स्वामी जी के प्रवचन यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं –

SadGuru Dham 

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  • SadGuru Times

    संकलन –‘हरिः ओऽम सद्गुरु टाइम्स’ (मासिक पत्रिका, सद्विप्र समाज सेवा हेतु समर्पित) से साभार

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