माँ का संघर्ष

 

माँ का संघर्ष

अल्पना एक गरीब और विधवा दो बच्चों की माँ थी उसके पति का निधन ३ वर्ष पहले ही हो चुका था। उसके दो बच्चे थे- रवि (१० वर्ष ) और किशन (८ वर्ष) अल्पना अपने दोनों बच्चों को पढ़ा लिखा कर एक कामयाब इंसान बनाना चाहती थी।

अल्पना अपनी रोज़ी – रोटी के लिए दूसरों के घरों में बर्तन धोने और झाडूं -पोछे का काम करती थी। वह बच्चों के साथ मुंबई के छोटे से चॉल मै रहती थी। सब कुछ ठीक ही चल रहा था बच्चे म्युनिसिपल्टी के स्कूल मैं पढ़-लिख रहे थे। ज़िन्दगी चल रही थी… फिर एक दिन अचानक अल्पना के जीवन मैं एक तूफ़ान आ गया। चॉल के सभी लोगों को जल्द से जल्द चॉल खाली करने का आदेश आ गया क्यूंकि वहाँ बड़े -बड़े बिल्डिंग बनने वाले थे। चॉल खाली करने के बदले उन्हें कुछ रकम भी दी जाने वाली थी ताकि वो लोग अपना दूसरा ठिकाना ढूंढ सके।

सभी लोग धीरे -धीरे चॉल को खाली करने लगे। अल्पना भी धीरे – धीरे अपना सारा सामान बांध रही थी।

‘पर हम जायेंगे कहा माँ ?’…. रवि ने पूछा।

‘भैया – भैया… हम लोग नए घर जायेंगे’ किशन ने चहकते हुए कहा।

अल्पना ने हलकी मुस्कान लेते हुए कहा, ‘हाँ हम लोग नए घर में जायेंगे, पर घर खली करने के बदले जो रकम मिलने वाली थी वो अब तक नहीं मिली थी, तो बिना पैसों के सब जायेंगे कहा?’

इसी उधेड़बुन में अल्पना खोई हुयी थी की अचानक की बहार किसी आदमी के जोर – जोर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी। अल्पना दौड़ कर बहार आयी तो देखा की घर खाली कराने के लिए कुछ लोग आये है।

‘अरी ओ मैडम…. कल तक घर खाली हो जाना चाहिए’, एक लम्बे कद वाले इंसान जिसका नाम जुबिन था उसने अल्पना को गुस्साए स्वर में कहा।
अल्पना ने कहा – ‘पर हमे तो पैसे नहीं मिले है साब ,फिर हम कहा जायेंगे? हमे रहने के लिए कोई ठिकाना चाहिए और बिना पैसों के ठिकाना कहा से मिलेगा साब ?’
‘पैसे कुछ दिनों में मिल जायेंगे, तुम सब लोगों का पैसा कही भागा नहीं जा रहा’ – जुबिन ने कहा।
अल्पना बोली- ‘बिना पैसे लिए चॉल नहीं खाली करेंगे।’

जुबिन को गुस्सा आ गया और उसने जीप से एक डंडा निकाला और अल्पना को डराने के ख्याल से जुबिन ने गुस्से में अल्पना के सर पर डंडे से प्रहार करना चाहा पर बीच में उसका छोटा बेटा किशन आ गया।
‘किशन ….’,अल्पना ने जोर – जोर से चिल्लाते हुए कहा।

किशन के सर पर बहुत जोर से चोट लगी थी और बहुत खून बह रहा था ये सब देख जुबिन डर गया और अपने साथियों को लेकर वह से भाग निकला। कई लोगों के मदद से अल्पना और उसके बड़े बेटे रवि, किशन को लेकर पास के एक अस्पताल में गए। उसके सर से खून बहें ही जा रहा था, किशन बेहोश हो चूका था। उसे अस्पताल में एडमिट कर लिया गया था।

डॉक्टर ने कहा, ‘ऑपरेशन करना पड़ेगा काफी खर्चा आएगा।’ पर बेचारी अल्पना के पास इतने पैसे कहा थे, पर एक माँ कहा हिमायत हारती है। उसने डॉक्टर से बोला की – ‘डॉक्टर साब , आप ऑपरेशन शुरू कीजिये मई पैसे का इंतज़ाम करके आती हूँ।’ फिर वो दौड़ते भागते जिन -जिन घरों मैं काम करती थी, उनके घर जाती है और पैसे मांगती है।

सभी लोग अल्पना को पैसे देकर उसकी मदद भी करते है, पर खून ज्यादा बह जाने के कारण डॉक्टर किशन को नहीं बचा पाए।
‘आई ऍम सॉरी’ डॉक्टर ने अल्पना से कहा। अल्पना बूत बनी अपने बेटे को निहारती रही और फिर अचानक से जोर – जोर से रोने लगी। रवि भी अपने छोटे भाई से लिपट कर रोये जा रहा था।

दो दिन बीत जाने के बाद अल्पना ने किशन के कातिल को सज़ा दिलाने के लिए पुलिस स्टेशन गयी और रिपोर्ट लिखवाई। पर जुबिन एक बड़े बिल्डर का दाहिना हाथ था, इसलिए उस बिल्डर ने पैसे के दम पर इस केस को रफा-दफा करने के लिए, एड़ी – चोटी एक कर दी। अल्पना को धमकियाँ मिलने लगी की केस वापस ले लो, नहीं तो बड़े बेटे से भी हाथ धोना पड़ेगा पर अल्पना के दिल में तो एक ज्वाला धधक रही थी , कातिल को सजा दिलाने की ज्वाला।

उसका साथ देने के लिए उसके बड़े बेटे के अलावा कोई भी नहीं था, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी।
अल्पना जिन घरों में काम करती थी, उन में से किसी एक मैडम ने बोला, ‘तूम क्यों नहीं किसी NGO की मदद लेती हों , NGO उसकी मदद जरूर करेगी न्याय दिलाने में।’

बस फिर क्या था-अल्पना के मन में एक आशा की किरण दिखाई दी, और अल्पना उसी मैडम को लेकर एक NGO के पास जाती है और अपनी पूरी कहानी सुनाती है। NGO उसकी मदद करने का पूरा आश्वासन देती है, शुरू होती है।

अल्पना को कई बार पुलिस स्टेशन के चक्कर काटने पड़ते है, हालाँकि अपने बेटे को न्याय दिलाने के दौरान अल्पना और रवि को अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ा , उन्हें हर समय धमकियाँ दी जाती थी , पर उस माँ बेटे ने हार नहीं मानी और अंत में जीत सच्चाई की हुई। जुबिन को उम्र कैद की सजा सुना दी गयी।

जब सजा सुनाई जा रही थी तब अल्पना और उसके बेटे रवि की आखों में एक अलग ही चमक दिखाई दे रही थी, किशन को न्याय दिलाने की चमक। अल्पना ने रवि से कहा- ‘रवि बेटा ,आज तुम्हारे भाई को इन्साफ मिल गया।’

रवि ने भी हलकी सी मुस्कान दी और माँ के गले लग गया।

किसी ने ठीक ही कहा है –
“अपने बच्चो के लिए लड़ जाती है सारे जहाँ से
इतनी हिम्मत न जाने माँ मैं आती है कहाँ से। “

 

नम्रता गुप्ता

 

 

 

 

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