Entries for Story Challenge #2

 

Entries for Story Challenge #2

 

1) मुझे प्यार हुआ था

 

आज ऑफिस के किसी जरूरी क्लाइंट के साथ मीटिंग थी इसलिए रोहित सुबह ही उठ गया था। अपनी प्रेज़ेंटेशन को एक दफा फाइनल टच देने का सोच कॉफ़ी का मग हाथ में लिए लैपटॉप में डूबा हुआ था। इतने में उसकी माँ ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, रोहित बेटा क्या बात है? कुछ ज्यादा काम है क्या? रात भर सोया कि नहीं?”रोहित ने अपनी मां की तरफ मुड़ कर कहा,” अरे नहीं माँ,  मैं सोया था पर जल्दी उठ गया। देखना था कुछ रह तो नहीं गया आज एक जरूरी प्रेजेंटेशन है।”

ऑफिस पहुंचकर जैसे ही रोहित ने कॉन्फ्रेंस रूम में रख कदम रखा उसकी नजर वहां पर बैठे एक लड़की की तरफ गयी। चेहरा जाना पहचाना हुआ था पर समझ में नहीं आ रहा था कि वो उसे जो सोच रहा है वह वही नहीं निकली तो लेने के देने ना पड़ जाए।ऊपर से प्रेजेंटेशन का टेंशन। ऐसे वक्त इन सब उलझनों में नहीं फँसना वह यह सोच ही रहा था कि उस  लड़की ने उसे देखा और कुछ इस तरह उसके चेहरे पर मुस्कान आयी जैसे उसने रोहित को पहचान लिया हो और आखिर उसनेअपना हाथ उठाकर  उत्सुकतावश सबके सामने उसे आवाज दी हाय  रोहित रोहित एक पल के लिए ठिठक सा गया आने वाले कुछ पलों में उसके दिमाग में पिछले 10 सालों का सफर तय कर लिया था।  कुछ सेकंड में उसे ऐसे लग रहा था जैसे कि वह कॉन्फ्रेंस रूम में नहीं पंजाब के अमृतसर के अपने मोहल्ले में पहुंच गया हो पर अचानक से जैसे उसे याद आया कि वह कहां है और उसे क्या करना है ?वहाँ उपस्थित सभी लोगों से औपचारिक रूप से मुलाकात करने के बाद रोहित ने अपना प्रेजेंटेशन दिया । प्रेजेंटेशन खत्म होने के बाद एक लंच ब्रेक था और उसके बाद वह सभी लोग आगे की पॉलिसी क्या होगी इसका निर्णय लेने वाले थे Iनिधि ने इशारा किया कि लंच ब्रेक में नीचे कैंटीन में मिलो।

रोहित अभी तक निधि को अपने सामने देखने के सदमे से बाहर नहीं आया था। जब आपके बचपन का पहला प्यार 10 साल बाद अचानक से सामने आ जाये तो ऐसा होना लाज़मी है। थोड़ी हिचकिचाहट, घबराहट, उत्सुकता और अजीब सी बैचेनी के साथ रोहित निधि को मिलने नीचे कैंटीन की तरफ बढ़ने लगा।

निधि मेहरा अमृतसर के हमारे वी पी सिंह हाईस्कूल की सबसे सुंदर लड़की जिससे हर लड़का दोस्ती करना चाहता था। रोहित के दोस्तों ने उससे पहले ही कह दिया था कि, “बेटा तेरे बस की बात नहीं है।अब तक हमारी तरफ देखा भी नहीं है और जिस तरह से तू शर्मीला और चोमू है तुमसे तो ना हो पायेगा।” 

अपने खयालों से निकलते ही रोहित कैंटीन मे पहुच गया और निधि को ढूंढने लगा। अचानक से किसी ने पीछे से रोहित के कंधे पर हाथ रखा तो देखा हाथ मे कॉफ़ी का मग लेकर पीछे निधि खड़ी थी होंठो पर वही पुरानी हंसी लेकर उसने रोहित से पूछा,” कैसे हो टॉपर?” रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा तो तुम्हें मेरा यह वाला नाम भी याद है “। इस पर निधि ने चुटकी लेते हुए कहा, “अरे भूल गए स्कूल में तो हैं लोग तुम्हारे असली नाम से कम और इस नाम से ज्यादा बुलाते थे।”  खैर छोड़ो आंटी अंकल कैसे हैं? और तुम यहां कैसे ?अमृतसर का टॉपर यहां मुंबई में क्या कर रहा है रोहित ने कहा जॉब के सिलसिले में यही शिफ्ट हो गया पापा को गुजरे 3 साल हो गए तबसे यही हूँ, अब यही हमारी कर्मभूमि है। तुम सुनाओ तुम जहां कैसे तुम तो इंदौर चली गई थी जब तुम्हारे पापा का ट्रांसफर हुआ था मैं तो सोचा ही नहीं था कि 10 साल बाद हम दोनों ऐसे मिलेंगे।  निधि ने कहा, “मम्मी पापा तो अभी भी इंदौर में ही है मैं ही सिर्फ जॉब के सिलसिले में अकेले यहां शिफ्ट हो गई हूँ। तुमसे मिलकर सच में बहुत अच्छा लगा। मैं तो अमृतसर में हमारे बचपन को बहुत मिस करती हूं वह भी क्या बेफिक्री के दिन थे ना यार!  कहां हम ये नौकरी, परफॉर्मेंस, प्रमोशन, कंपटीशन टारगेट ये सब के चक्कर में पड़े हैं एक पल का सुकून नहीं छुट्टियां तो छोड़ो छुट्टी वाले दिन भी दिन भर फोन बजते ही रहता है । रोहित उसे बस एकटक देखे जा रहा था और फिर मुस्कुरा कर उसने कहा,” तुम बिल्कुल नहीं बदली ना निधि हम भी इतना ही बोलती हो जितना पहले बोलती थी । इस पर निधि ने जवाब दिया, “भई इसी के पैसे मिलते हैं हम सेल्स और मार्केटिंग वालों को ।” और दोनों खिलाकर हंस पड़े।

मीटिंग खत्म होने के बाद उन दोनों ने अपने नंबर एक्सचेंज किये और एक दूसरे के घर आने का निमंत्रण देकर चले गए। शाम को जब रोहित घर लौटा तो वह फिर से अतीत की यादों में खो गया। कहते हैं की चमत्कार होने में देर नहीं लगती जिस निधि मेहरा से दोस्ती करने के लिए सहारा स्कूल तड़प रहा था वह लड़की हमारे पड़ोस के मोहल्ले में ही अपने परिवार के साथ किराए के मकान में रहने के लिए आ गयी थी। रोहित को अपनी किस्मत पर रश्क हो रहा था और बाकी लड़कों को जलन रोहित निधि और उसका छोटा भाई एक ही ऑटो में स्कूल से घर और घर से स्कूल जाते थे। निधि के पापा सब इंस्पेक्टर थे इसलिए किसी लड़की की हिम्मत नहीं होती कि मेरी के सामने जाकर बात करे। उस समय  टेलीफोन ही एक बात करने का सहारा था वरना आजकल के समय नहीं मोबाइल में वॉइस कॉल से लेकर वीडियो कॉल सब तरह की सुविधा है सब कुछ इतना तेज है शायद इसीलिए एक रिप्लाई ना आए ब्रेकअप होने में समय नहीं लगता।

 एक ही मोहल्ले और साथ में आने जाने के कारण रोहित और निधि की अच्छी दोस्ती हो गई थी निधि स्वभाव से चंचल और हंसमुख थी और रोहित इसके बिल्कुल विपरीत । रोहित का निधि के प्रति आकर्षित होना स्वाभविक था। आते जाते उसे देखना, शाम को पार्क में बैठकर घंटों स्कूल और दोस्तों के बारे में बात करना, बात करते-करते उसका एक हल्का सा स्पर्श रोहित के पूरे बदन में रोमांच भर देता था ।यह प्यार था या नहीं पर रोहित को यकीन हो गया था जीवन निधि को पसंद करने लगा है और वह उसके लिए एक दोस्त से ज्यादा मायने रखती है।  पर एक तरफा प्यार में रोहित की कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि वह निधि से अपने प्यार का इजहार करे। 10वीं की बोर्ड की परीक्षाएं नजदीक आने वाली थी और उससे पहले स्कूल में फेयरवेल था। रोहित के दोस्तों ने उससे साफ कह दिया था कि अगर वह अपने दिल की बात उसे फेयरवेल वाले दिन नहीं कह पाया तो कभी नहीं कह पाएगा रोहित के लिए यह सब जितना मुशिकल था उससे ज्यादा नामुमकिन और खतरों से भरा । नामुमकिन इसलिए क्योंकि वह स्वभाव से शर्मिला था और खतरो से भरा इसलिए कि कहीं अपने प्यार का इजहार करने के चक्कर में 3 सालों की दोस्ती भी खराब ना हो जाए।

पर रोहित के दोस्त कहां मानने वाले थे उन्होंने रोहित को पूरी तरह से तैयार कर दिया था कि वह फेयरवेल वाले दिन निधि को अपने मन की बात बताएगा और तो और उसके दोस्तों ने फूलों के गुलदस्ते की भी तैयारी कर ली थी। रोहित मरता क्या न करता आखिर उसने अपने दोस्तों की मान ली और फेयरवेल वाले दिन निधि के घर के पास जाकर उसके बाहर आने का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद निधि अपने घर से बाहर निकली ।लाल रंग की काली बॉर्डर वाली साड़ी उस पर बहुत जच रही थी रोहित बस उसे देखता ही रह गया और इतना खो गया कि पीछे हाथ में छुपाया हुआ गुलदस्ता नीचे गिर गया ।निधि ने रोहित को इस हालत में देखकर पूछा, “क्या हुआ रोहित? ऑल ओके? सब ठीक है ?अरे यह क्या? थैंक गॉड तुम गुलदस्ता ले आए मैंने अपने भाई को भेजा था तुम्हें मैसेज देने के लिए मुझे गुलाब के फूल चाहिए मुझे लगा वो बेवकूफ तुम्हे मेसेज नहीं देगा चलो अच्छा हुआ। निधि ने आगे  कहा, “तुम्हें तो पता ही होगा आज स्कूल में सबसे ज्यादा गुलाब का फूल पाने वाली लड़की को मिस मोस्ट वांटेड का खिताब मिलने वाला है और मैं चाहती थी कि सबसे ज्यादा गुलाब मेरे हाथ में हो। इस गुलदस्ते से काम चला लूंगी। गुलाब निकालकर अलग कर दूंगी,  अच्छा हुआ मेरा टाइम बच गया वरना मैं बाजार जाने वाली थी।”थैंक्स

रोहित कुछ न समझ पाया न कह पाया बस निधि के साथ चल दिया। परीक्षाएं खत्म होने के बाद भी निधि के पापा की इंदौर ट्रांसफर हो गई ।रिजल्ट वाले दिन भी रोहित की मुलाकात निधि से नहीं और प्यार दिल में दफन रह गया । कुछ सालों तक पहले फोन में बात होती रही फिर वो सिलसिला भी रुक गया । हालांकि इस बात को 10 साल की चुके थे पर रोहित अभी तक निधि को भुला नहीं पाया था और उसके बाद कई लोगों से मुलाकात होने के बाद भी इससे किसी और को अपने करीब आने नहीं दिया या महसूस ही नहीं किया। पहले प्यार का खुमार ही अलग होता है और जब वे एकतरफा हो तो भूले नही भूलता।

अचानक से रोहित के मोबाईल की लाइट जली और व्हाट्सएप में निधि का मेसेज आया। क्या प्लान है वीकेंड का? रोहित ने मेसेज का जवाब दिया कुछ नहीं घर पर ही हूँ।

निधि का वापस मेसेज आया कोई लड़की नही पटी अभी तक? और एक स्माईली इमोजी साथ में।

रोहित अब टाइप करते करते रूक गया और सोचने लगा अब इसे कैसे जवाब दूँ कि “मुझे प्यार हुआ था और तुमसे ही हुआ था। “

 

आरती

 


 

2) I found mine tell me yours!

 

It never felt like it would happen ever. I entered a new class of a new school as an outcast to an well rehearsed play to witness an adventurous journey of life . Amongst all new characters , enjoying life , playing and experiencing the age of attraction ; the teenage , I found a special character maybe not special then but a lot special now .
An interesting human being; a rimmed spectacle guy , introvert and shy was himself a peace among all the chaos that lead . Little shy smiles , small friendly talks were first things that made us get along. Nothing special did we had back then instead of warm greetings , waving to each other, oh! Of course some 'whatsaap chats'. With no time did the school life of adventurous journey ended with some sadness and memories and with him was one group photo and a great feeling of friendship.
And now at the time of bidding away everyone and i thought i might not meet him again tp experience some more paths in our friendship.
After months of graduating from oir school , one find day I met this peace carrying human being amidst the crowd of our college canteen .

A sweet 'Hi, how are you…?' came from his side.
'Hi , how are you?', I replied

Nothing but the smile on his face had something mesmerizing. Friendship grew more and so did the meeting. Every day during the last hours of my class the only thought i had was , “is he waiting there for me?' , ” will i meet him again?” Never did i thought of him waiting before but he did . He would stand near a pharmacy and seeing him i always smiled at my heart but he never knew. The scroching heat of the sun, the heat waves were what we encountered together some days even the terrific rain. It was all special nothing romantic but overwhelming. This became our every day ritual .
Then one fine day came the pandemic and brought the phase of not meeting . All packed in cages like animals ,we also our time together and we found 'us' again missed out .Things never overboarded but all i missed was the friendship and peace he gave.
Alas !with this two years passed by and I never knew how he was . I adjusted with the fact of never founding him again in life. I did not forget him as he was also lying in one corner of my heart whose door i never visited.

Those years later one chilly november evening of Shillong, i was reminded myself that today is his birthday and it sparked my heart with glee and run catched my cell phone to wish him a very happy birthday. But the second thought I had was ” is he still using this number”, ” will he ever reply to me back”? A chill line of nervousness ran through my spine and my blood as i texted him, “Happy birthday” . The message showed the single black tick which made my heart numb of sadness with a thought that maybe the number was not the exact way to reach him . I kept my phone with despondence and heavy heart. Minutes later, my notification buzzed and i ran towards my phone and it was him that read ;”thank you so much ” . My silently danced in glee on founding back something i thought i had lost almost year ago. The birthday brought our bond back . We started talking again sharing ourselves like we never did before . But the sense of belongingness was same maybe a little more now . Those small talks now became the longest . From taking care of each other , to be each others back and laughing on each other's bad jokes, we became best of friends.

Little did I know this old school introvert fellow to whom i hardly spoke in school would be my habit of life and my own Prince charming. He did not arrive in a white horse with bunch of flowers but he did arrive bunch of happiness and peace .
The bond grew stronger and stronger , days and nights had everything and us revolving in each other's orbit. And I found loved, it was like a discovery; my self found discovery . With moon sparking bright on a chilly december heavenly night he whispered to me the magical words of my life ; ” i love you “
My wings were set free to fly in the sky of love with roses all around. My dream of being loved was now fulfilled . I was owned by the purest of souls alive .It all felt like a dream but it was real.

I found my prince charming in the middle of this chaotic world of hatred and enmity. With laughter, joy, anger and fighting we made our ways as we walk together in love and faith.

Every story in itself is a masterpiece whether with climax , drama , hatred or with simplicity , love and the fear of losing but winning over again .

 

Deboleena Bhattacharjee

 


3) साथी

 

“साहेब, आज मुझे थोड़ा जल्दी घर जाना है। कल मेरी बेटी की परीक्षा सुबह है। सेंटर थोड़ा दूर है। “
वकील साहब से उनके डाइवर दीना ने कहा।

“अरे हाँ- हाँ मैं तो भूल गया था ।”अपने पर्स से कुछ पैसे निकालते हुए वकील साहब ने कहा, “तुम्हारी बेटी बडी़ होनहार है , वो तुम्हारा नाम रोशन करेगी ।”

आज दीना की बेटी विधि की यूपीपीसीएस जे. की मेंस परीक्षा है। दीना के दो बेटियाँ हैं और उसने उन्हें हमेशा पढ़ाई के प्रति प्रेरित किया। बडी़ बेटी विधि ने स्नातक के बाद कानून की प़ढाई की इच्छा जाहिर की तो दीना को बहुत खुशी हुई। बचपन से ही न्यायालय ,और वकालत की बातें सुनसुन कर उसका मन अलग ही सपना बुन रहा था। अनपढ़ माँ और आठवीं पास पिता की सीमित आय और कम सुविधाओं के साथ ये सपना आसान नहीं था।

वहीं दूसरी ओर विधि अपनी किताबों के बीच घिरी हुई अपने नोट्स दोहरा रही थी। वो सारे पन्ने एक के बाद एक पलटती पढ़ती , जैसे मानो सब कुछ उसके दिमाग में रहे कुछ छूट न जाए।
एकाएक उसकी निगाह सामने टंगी तसवीर पर जा टिकी। वो तसवीर विधि की थी सफेद फूलों के गुलदस्ते के साथ। वो मुसकुराए बिना न रह सकी। विचारों को झटकते हुए वापस से किताबों में उलझ गई। परीक्षा अच्छे से हुई तो विधि की उम्मीद भी बढ़ गई। परीक्षा देकर वो घर आई तो उसका फोन बज उठा। फोन पर आए नाम को देख विधि हलके से मुसकुरा दी।

उसने फोन उठाया, “हेलो”
दूसरी तरफ सिद्धांत था।

“हेलो, विधि , पेपर कैसा रहा? “मुझे भरोसा है अच्छा हुआ होगा। है न! “
विधि मुस्कुरा दी ,हाँ अच्छा था बाकी रिजल्ट आने दो” और तुम्हारा?तुम्हारा कैसा रहा? “

“बढियाँ!”सिद्धांत ने कहा।

“विधि, मेरी बात याद है न!सिद्धांत ने हिचकते हुए विधि से पूछा।

विधि ने बहाना बनाते कहा, इस बारे में बाद में बात करते हैं ।अभी फोन रखती हूँ पापा बुला रहे हैं। इंटरव्यू के लिए गुड लक! “”कहकर विधि ने फोन रख दिया।

सिद्धांत मुस्कुरा दिया और अपने कालेज के दिनों में खो गया। जहाँ उसकी दोस्ती विधि से हुई। सादगी से रहने वाली विधि को अपने आप पर बहुत भरोसा था, वो हर बात पर अपनी बात कहना जानती थी। उसकी यही बातें उसे औरों से अलग बनाती थीं। सिद्धांत उसे पसंद करता था। विधि के जन्मदिन पर सारे दोस्तों ने मिलकर सरप्राइज प्लान किया।सबने जन्मदिन की शुभ कामनाए दीं, उपहार दिए।

सिद्धांत ने उसे सफेद फूलों का गुलदस्ता भेंट किया। और कहा, “मैनें जैसे ही इन फूलों को देखा मुझे इनकी सादगी में तुम्हारी झलक दिखी। ढेर सारे रंगों के बीच ये सफेद फूल अपनी सौम्यता लिए मुस्कुरा रहे थे। “

“सादगी का अपना ही रंग होता है विधि, तुम्हारी सादगी और सरलता को मैं हमेशा अपने जीवन में देखना चाहता हूँ”। मैं तुम्हें पसंद करता हूँ, विधि और तुम्हें
अपने जीवनसाथी के रुप में देखना चाहता हूँ। “क्या तुम मेरी साथी बनोगी? “

विधि सब कुछ सुनती रही और एक गहरी सांस लेकर बोली, “सिद्धांत, तुम बहुत अच्छे हो मैं तुम्हें पसंद करती हूँ, मगर, मेरे सपने कुछ और हैं, और मेरे परिवार के प्रति मेरा कुछ दायित्व है जो मुझे पूरा करना है ।”

“मुझे नहीं पता अभी कितना समय और चाहिए मुझे अपने और अपने परिवार के सपनों के लिए। मैं अभी कुछ और सोच ही नहीं सकती सिद्धांत, मैं तुम्हें झूठी आस नहीं दूगीं। बहुत कुछ है जो हमारे बीच असमान है।”

“मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बना रहा विधि, तुम जितना समय चाहो, लो ,मगर इतना ही चाहता हूँ जब भी अपने सपनों और दायित्वों से अलग सोचो तो मेरा भी एक नाम याद रखना। “मैं इतंजार करूंगा”।

सिद्धांत और विधि लाॅ कालेज में साथ थे। सिद्धांत के पिता एक सिविल जज थे। दोनों ने इंटरव्यू भी पास कर लिया। आज परीक्षा परिणाम आया, विधि ने सर्वाधिक अकं प्राप्त किए । उसके परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था, फोन पर फोन बज रहे थे। बधाई पर बधाई मिल रही थी।

विधि को उसकी मेहनत का फल मिला वो बहुत खुश थी। मगर बार बार फोन देखती कि कहीं सिद्धांत का कोई मिस काल तो नहीं, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई,

विधि ने मुड़कर देखा तो सिद्धांत खडा़ मुस्कुरा रहा था। विधि खुश होकर उसकी ओर बढी़ कि तभी पीछे छुपाए सफेद फूलों के गुलदस्ते को देते हुए सिद्धांत ने कहा ,”मुझे अपनी पसंद पर गर्व है विधि। “

विधि ने मुसकुरा कर कहा “,तुमको भी बधाई सिद्धांत! तुम्हे भी अच्छी रैंक मिली है मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ। “

“मैनैं सोचा भी नहीं था कि तुम यहांँ आज आओगे।

“थैकं यू, सिद्धांत। “

गुलदस्ते में से एक फूल निकाल कर सिद्धांत को देते हुए विधि ने कहा, “तुमने मेरे सपनों और जिम्मेदारी का सम्मान किया, मुझे समझा और प्रोत्साहित किया।बिना किसी वायदे के मेरा इतंजार किया । मुझे तुम्हारी बात याद है सिद्धांत । तुमको अपना जीवन साथी के रूप में पाकर मैं खुद को भाग्यशाली समझूगीं। क्या तुम हमेशा मुझ पर ऐसे ही भरोसा करोगे ? ऐसे ही मेरा साथ दोगे?
सिद्धांत, क्या तुम मुझे अपना साथी बनाओगे?”

दोनों की आँखे खुशी से भीग गईं।
सिद्धांत ने विधि को गले लगा लिया।

 

मीनू यतिन

 

 


 

4) Peace Lily

 

Rajat stormed out of the house. He felt Manisha's eyes  boring into him. He was past caring, outside he lighted a cigarette, the puff relieved him somewhat. Should he go to a bar, Rajat fiddled with the car keys. Strangely he did not have much place to go, he tried to recall the go to friends he had..Avnish, Bhaskar, Anupam…

Rajat decided on a bar, his temper had subsided. Sipping his drink he wondered for the umpteenth time, nuptial tie was not meant for him! Or was it Manisha, fiery, carefree, independent not at all meant to be within four walls of home! What was it he wanted, a beautifully kept house, kids well taken care of, warm dinner served at the table. Naah he wasn't that, even Manisha knew that! Caring, supportive, though not much into household chores he saw to it they had helps to sail them get through. Yet what women are after, what the hell they want. He never stopped her from hanging out with friends, well was that a virtue…was marriage about stopping one another! But why do women nag…nag and nag. The waiter refilled his glass. Nag about being clean , cleanliness had atrocious definitions according to them, nag about their parents, nag about non existent issues, nag about lacking romance! Like really they imagine a SRK sort charming them, pampering them. Come on, they can't be that silly!

He stared at his mobile absentmindedly, no message from Manisha yet. Would she be worried! Or she was chatting away with her mom or that brat of a girl Rohini! Both must be convincing her what a mistake she had made getting hitched to him. The thought infuriated him, should he call her…huh why would he. He needed some fresh air and another puff. What fuss women make about drinks and smoke…the mobile flashed just then.

'Come home' Rajat stared at the message for a long time. He wasn't sure whether he was relieved, whether he was waiting for that.. mobile beeped again..

'Where are you?'

'Do you care!' …Manisha does not like the melodrama, Rajat knew.

The phone rang then….

' Yes..'

' Do I have to come and get you!'

Oh yes! But how can he admit that!

'Thanks'

'Send me the location'

'I can manage Manisha…you don't have to pretend you care, you don't…'

'Tell me when you are done' She hung up.

'I shouldn't have taken the car' Rajat shook his head in frustration, sending Manisha his location.

Rajat was waiting outside the pub. Whiff of fresh flowers tickled his nose…Lilies were Manisha's favourite or wait…was it those colourful Carnations. Nah bunch of white Lilies may be for today. Rajat asked the vendor to make a bouquet for him.

The car just flashed it's blinkers then and instantly Rajat lost his enthusiasm foreseeing the allegations and bitterness. He let out a sigh , payed the vendor and lied that he's going to collect it late.

They were riding in silence after around an hour.

'Brake…Brake' Rajat was warning as usual, Manisha glared hard at him.

'Left Isha…left'

Manisha turned the volume knob to a high!

How do people listen to such pathetic music, Rajat tried to shut his ears off…

They didn't exchange any more words. Manisha was preparing for bed.

'I can heat food if you want'

'I am not hungry'

Manisha shrugged and went off to bed. Rajat knew she could not go to bed hungry. He could feel her toss and turn.

He gave up finally.

'Isha I'm heating up the food, will call you once done'

He suppressed his smile, watching the tigress going after the kill!

'Nothing funny' she didn't look up.

'Who said it was' Smiling he dug into the fried rice…

Women! Sugar…spice…she was a perfect mix!

He was watching her eat! She looked up to join him!

'All that was an excuse for all the drink' She quipped…

There goes….sugar..spice but not at all every thing nice! Was that the fun actually!

Rajat crossed his arms…opened his mouth..let out a breath.

'Did you buy those Lilies….' Manisha looked up for a moment!

'I didn't dare to get them!'

'I'm a demon you make me feel!' She sulked…was that a smile underneath that…

'A war monger ferocious demon you are! Lilies are better off with the flower wallah!'

Their eyes laughed silently as they finished their dinner!

 

 

Soma Bhattacharjee

 

 

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