Entries for Poetry Challenge #1

 

Entries for Poetry Challenge #1

 

1 सोचा, के समंदर तुझसे मिलते चलते हैं।  WINNER

 

सुना है ,तूफान कहीं तुझमें पलते हैं
सोचा, के समदंर तुझसे मिलते चलते हैं
किनारे पे बैठ कर ख्याल क्या बुनें
लहरों के आने जाने की क्या गिनतियाँ करें

बस यही सोच के ऐ दोस्त ,तुझमें उतरते हैं
सोचा के समंदर तुझसे मिलते चलते हैं ।

तेरा मन कभी भर आए तो उछाल देता है
न जाने कितनी चीजों को तू पनाह देता है
देखें भला क्या है छिपा तेरे अंदर

क्यों जहाँ तेरी गहराई की मिसाल देता है
नाप लूँ तेरी गहराई ,
जान लूँ तुझे समंदर
तेरी मौजौं के हवाले खुद को करते हैं

बस यही सोच के ऐ दोस्त तुझमें उतरते हैं
सोचा ,के समंदर तुझसे मिलते चलते हैं ।

मुझे अपने आगोश में ले रही हैं
तेरी लहरें मेरे संग खेल रही हैं
बहुत खूबसूरत है
तेरे भीतर की दुनिया
जहाँ तक जाती हैं नजरें तू ही तू है
तू बेहद है मगर तेरी भी हद है
तू जोड़ता है, और बाटताँ है,
मुल्कों को
तू खुद भी राह है ,
जमीन की सरहद है
बस यही सोच के ऐ दोस्त तुझमें उतरते हैं
सोचा, के समंदर तुझसे मिलते चलते हैं।

सोचा, के समंदर तुझसे मिलते चलते हैं।

 

मीनू यतिन

 


 

2. कुछ जोख़िम लें 

 

जीवन का गणित खूब खेल लिया,

हर क्षण का दिया अचूक हिसाब,

चलो उठा लें जोखिम का झोला,

अब लें जिंदगी के मज़े जनाब,

 

कुछ रूढ़िबद्धता छोड़कर बस,

साहस जीवन से जोड़ना होगा,

कुछ सीखे नियमों को तोड़कर,

नए क्षितिजों को कोड़ना होगा,

 

अपने मन के डर से लड़कर,

बाधाओं पर विजय पाएंगे,

कई बार प्रयत्न करने वाले ही,

अंत में बाज़ी मार जाएंगे,

 

फिर ख़ुद से साक्षात्कार करेंगे,

कभी सागर,कभी पहाड़ों में,

निज प्रकाश में होंगे जगमग,

भटकेंगें ना बाह्य सहारों में,

 

ज़रूरी बस जोख़िम का जस्बा,

बदल दे नीरस जीवन का स्वाद,

क्या मिलेगा डर डर के जीने से,

इच्छाओं के नभ में उड़े आज़ाद।।

 

अपर्णा घोष 
 

 

3. रूह के समुंदर

 

मत निकल तू बाहर आईना ढूँढने,

दुनिया अक्स नहीं, औक़ात दिखाती है..

 

तू ठहर जा अपनी रूह के समुंदर में,

असल बेमिसाल झाँकी तेरी, वहीं दिखती हैं…

 

दागी आईना दगा देगा, 

जो तू है ही नहीं , वो कहलायेगा.

कहते सुनते तू भी दुनिया सा बन जायेगा,

फिर ख़ुद की तलाश में दर दर भटकाता रहेगा..

 

बस ठहर जा अपनी रूह की समंदर में,

क्योंकि नायाब नगीने वही महफूस रहते हैं,,

 

गल जो गया, ढल जो गया,समझले तू तर गया

न जल ना ज़मीन है तू, अब सारा जहाँ तू बन गया 

भर ले बंदे भीतर अपने,सुकून तू समुंदर का

अब बह जा डुनिया  में तू फ़रिश्ते

बस अंश नहीं, तू ख़ुद ख़ुदा का अक्स बन गया

 

जान्हवी जगदले

 


 

4. *आत्मविश्वास*

 

जिस तरह जरूरी है पानी में गोते लगाकर 

सांस लेने के लिए थोड़ी देर के लिये ऊपर आना ।

उसी तरह जिंदगी के सफर में आगे बढ़ने के लिए

जरूरी है तूफानों का करना सामना।

 

इन तूफानों से ही मनुष्य को मिलती है

चुनौतीयो का सामना करने की ताकत 

ये तूफान ही एहसास कराते है क्या होती है

मुश्किलों से लड़कर मंजिल पाने की राहत।

 

जीवन सिर्फ वही नहीं जितना पानी के ऊपर नज़र आता है।

वही सफल है जो मन के अंदर के

तूफानों से सामना कर मंजिल पाता है।

 

आरती सामंत

 


5. 

Deepwater

From above
Its sparkly, dreamy, beautiful
But, when you go Inside
It's very deep
The bounds of which,
U can't reach

The life we imagined
As a child,
It isn't that easy
And we need to stay,
Vigillent with every storm
That goes by

This is the adult world
Whose deep waters can,
Make you float or
Make you drown

The flood advances,
With each passing drag
I'm trying to withhold,
These emotions
Decoding my thoughts,
Holding up for my beliefs,
I wish to take the lead
And be the
Deep water,
You might wish to
Dive in…

 

Nidhi Parikh

 


 

6.

Drowning glory…

When I chase hallucinations with passion wild
When I seek love,where there is none…
When I get obsessed in my own hell
That is when I feel myself drown!

My reasons,sanity all fail
I run after myth to gasp in real..
Years ago I have crossed that age
Yet unable to handle the emotional garbage!

Like sick,I seek love
Not settle for anything less
One sided and unrequited
Yet I'm into a wild goose chase!

Can't get myself to talk sense
I drown in my created mess…
Torn, shattered, battered and hurt
Scream for life …drown to glory but!

 

Soma Bhattacharjee

 


 

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